पहौनका थारु राजासब

स्व.श्री दुर्गानन्द चौधरी - १४ (शिक्षक) सन्स्थापक सम्पादक बिलु गङाराम सेवा समिती लहान -११, पडरिया सि
थारु समुदाय के इतिहास राज्य और शासन व्यवस्था थारु शब्द सेही रूपस्ट हैछै। एकटा ज्योतिशाचार्य के विचार आधारसे "था + रु" दुइटा अक्षर मिलके थारू शब्द बनल जेकर अर्थ गरिमामय है छै . 'था' हिन्दी के भाषाके भूतकालिक सहायक कियापद चियै । जेकर अर्थ "छेलें" और "रु" संस्कृत शब्द के अर्थ "प्रकाशमान" है छै । " था + रु" शब्दके अर्थ संयुक्त रुपये "एक समय में थारु सब प्रकाशमान या पूज्य योग्य रहई। "वइ आचार्यके कहनाइके अर्थ थारुसब आदिकालमें राजा महाराजा रहई। याद राजासबले राज्यकालमे जनतासब सुखी सम्पन्न रहई। यहै थारू कुलमे शान्तिके अग्रदूत गौतम बुद्ध सोहो भेल रहई। जे अपन बौद्दित्वके प्रभावसे बुद्ध धर्मके सोहो जन्म देलकै और एक समयमे हिन्दू धर्मके भी पराजित क्याके संसारमे अपन बाहुल्य कायम केने रहइ । साँच्चे कहब त पूर्व मेचीसे ल्याके पश्चिम महाकालीके साथे भारतके चाम्पारन, गोरखपुर, कुमाउ, गढ़वाल तकके तराईके भू-भागमे थारू सबके गणराज्य स्वायत आर स्वतन्त्र राज्यव्यवस्था रहई । यी वातके समर्थनमें कुछ विद्वानसबके विचार यहेन छै :-
१. हयामिल्टनके अनुसार "मुकुन्द सेन प्रथमके वंश चितौरगढ़ से याल रहै अखौनका बेतिया दिसन रहके क्रममे थारु सबके प्रमुखके नोकरी करल्कै । तेकरबादमे हुनकर बेटासब अजित सेन आरे टुंथासेन तराई दिसनके बुटवल और रिसिङ्गा दिसनके कुछ भागमे अपन अधिकार जमेलकै ।"
२. समर बहादर के अनुसार -"सेन वंश पहिने तराईदिसन बैठल और थारुसबके प्रमुखकै नोकरी केला केवादमे टुंथासेन रिसिङग, रुद्रसेन बुटवल और रिद्विसेन पाल्पा राज्य खड़ा करलकै ।"
३. भवदत के " पहिने थारु गणराज्य रहई । मुकुन्द सेन प्रथम थारुसबके प्रमुखके नोकरी केलकै ।"
४. डा. राजेश गौतमके अनुसार - "मोरङगके राज्य प्रमुख किराँत बहुत शक्तिशाली रहई। जे तिर किराँत रहई । तिर् किराँत हि तराईमे बैठलाहा थारु सब चियै ।
५. डा. केशवमानके अनुसार - " नेपालले कपिलबस्तु थारु सबके शाक्य गणराज्यमे भगवान गौतम बुद्ध राजकुमार सिद्धार्थ नामके राजा शुद्धोदन और महारानी मायादेवी के कोखबाटे जन्म लेने रहई । "
६ अनुसन्धानकर्ता डोर बहादुर विष्टके अनुसार - "दाङ्गके सुगौरागढमे थारु राजा दंगौभुसाई और सप्तरी जिल्लामे कनाकापट्टीगढी राजा चन्द्रसेन थरुके पुराना किल्लाके अवशेषचियै ।
यी उपरका विद्वान सबके अनुसार आइके थारुसब पौहनका राजा महाराजा रहईशे प्रमाणित हैछै । पुराना थारु राजा और राजगढमेसे दाङ्ग जिल्लाके सुगौरागढ़मे दाङ्गीराजा दंगौभुसाई , सप्तरी जिल्लाके कनकपट्टीगढी राजा चन्द्रसेन थारुके साथे मान्नगर गढी माने माइझके मानराजा मंदिरगढ़ पुराना किल्लाके अवशेषके रुपमे छै । लवपुर्निमा मासिक पत्रिका सप्तरीके शिर्षक ''थारु राजा आदिपुरुष तिरहुत माइझ महुली लदी " लेख अनुसार तिरहुत माइझ तिर्कौल सप्तरी निवासी तिरहुत राज्यके राजा रहइ । बुद्ध और थारुसबके पौराणिक इतिहासमे सम्राट अशोक चल्ल, चन्द्रगुप्त मौर्य , शुद्धोदन जेसन पराक्रमी और प्रतापी राजासब थारुवे रहइ ,प्रमाणित सहो करैछै । सयौ अनुसन्धान और इतिहासके दस्ताबेज एवम प्राचीन और मध्यकालमे धनिकहा कृषि क्षेत्र तराईमे थारुसबके बसोबास रहै । जे बहौत राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्रके सहारा रहइ । यी ठाममे विदेह थारुके जनकपुर , शाक्य थारुके लुम्बिनी ,सेन थारुके चम्पारण , गोरखपुर बुटवल , पाल्पा ,मकवानपुर ,सप्तरी के साथे किर किरात थारुके बिजयापुरगढ़ी ,सुनसरी , मोरङ और कर्णाढ दनुवारके सिम्रौनगढ़ बारा जेसन बहौत राज्य रहे ।
स्व.श्री दुर्गानन्द चौधरी - १४
१. भू . पु . अध्यक्ष
बरियार परिबार कर्मचारी समिती
२. भू . पु . प्रधानाध्यापक
श्री मा . वि . पडरिया थारुटोल, लहान ना.पा. १२ , सिरहा
थारु समुदायके चिन्हा परिचय

बुद्धसेन चौधरी बरीयार, सबैया दमाबती, सप्तरी
परिचयः
थारु नेपालके दोसर बडका आदिवासी जनजाति समुदाय चियै । थारु नेपालेटाके बलकी संसारके पुरनकासे पुरनका लोकमेसे एक चियै । एकर उत्पैत हिमालके निचामे रहलहा जम्बुदिपमे भेलछै । इ समुदाय नेपालके पुरवमे झापासे ल्याके पछिम कंचनपुर तैकके जिल्ला आ भितरी तराई उपत्यका सुर्खेत, दाङ्, चितवन, मकवानपुर, उदयपुर और इन्डियाके कुछ ठाममे बसोवास करैत एलछै । थारु यैसनाके प्रथम जाति चियै । राष्ट्रिय जनगणना २०७८ मताबिक नेपालके पुरा जनसंख्या २,९१,६४,५७८ रहलछै । जैमे थारु समुदायके जनसंख्या १८,०७,१२४ आ राना थारुको जनसंख्या ८३,३०८ कैरके पुरा थारु समुदायके जनसंख्या १८,९०,४३२ रहलछै । इ पुरा नेपालके जनसंख्याके ६.४९ प्रतिशत हैछै शाब्दिक अर्थः थारु शब्दके उत्पति केनङखे भेलै यैमे इतिहासकारसबके एकमत नैछै । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानसे प्रकाशन करलहा नेपाली बृहत शब्दकोषके दशौ संस्करण, २०७५ मे थारुके नेपालको तराई र भित्री मदेसमा बसोबास गर्ने एक जाति वा त्यसको भाषा भनि उल्लेख गरेको छ । स्थविर शब्देसे थारुको व्युत्पति भेलछै से माइन सकैचियै । थारुसब अपनाके थारु से बेसी थौर, ठौर, थउर उच्चारण करैछै । था के अर्थ तर आ रु के अर्थ रहैवला हैछै । यैसे थारुके तराईवासी बुइझ सकैचियै । थारु भाषामे ठौर के मतलब जगह आ गर(सुरक्षित ठाम) सेहो बुझाइछै । अखैनियो दोसर समुदायके लोकसब तराई झरैछै आ ओकरा वास रहे परैछै त सबसे पैहने थरुहट बस्ती आ गाम ताकैछै । ओहौसे थौर/ठौर के मतलव सुरक्षित जगह हैछै । ओहै थौरसे पाछे पाछे थारु भ्याल हेतै । अखैनियो बोलिचालीमे तराइके दोसर समुदायसव थारुके थौर कैहतेछै । दोसर बात थारु भाषामे ठार आ ठाढ के मतलव खडा हेनाइ, अरनाइ सेहो हैछै । एके ठाममे रहलाके चल्ते ओहौ हिसाबसे थारु भ्याल हेतै सेहो माइनसकै चियै । जेकरा डोर बहादुर बिष्ट (बिष्ट, २००६) ले आज सम्म कुनै पनि थारुले न सिमापरीको भारतलाई नजिकको ठान्छ न पहाड उक्लेर आफ्नो भाग्य नै अजमाउन खोजेको छ । यति ठुलो बथान भईकन पनि आफ्नो माटो, पानी र वरिपरिका जंगलसंग नै नङ र मासुजस्तै गरी गाँसिएको जीवन अरु कुनै जातिको छैन होला भनेर उल्लेख गरेका छन् । ओइ समयमे कोनो ठाम आ लोकके नाम ओकर स्वभाव और कामके हिसाबसे तोकल जाइछेलै । थारु हतपत ठौर छोइरके नै जाइछै । एकेठाममे बेसीसे बेसी रहलाके चल्ते ओकरा थारु बोलाइले लागल हेतै सेहो मानल जाइछै । सुवोध कुमार सिंह,(२०१३) के अनुसार थेरावादी बुद्धमार्गीहरुलाई “स्थविर” भनिन्थ्यो र त्यसै शब्दबाट “थारु” नाम आएको हो । स्थवीरबाट थवीर र थविरबाट थारु हुनु नै सरल र तार्किक शाब्दिक परिवर्तन हो । (द्विवेदी (१९५५;३)से दोसर तरफ उल्लेख करैत “स्थारु” को छोटोरुप नै थारु हो, जसको अर्थ हुन्छ साविक स्थानमा नै बस्नु । वहाँका अनुसार बुद्धले ज्ञान प्राप्त गरीसकेपछि पहिलो पल्ट कपिलवस्तु आउँदा सबै उनका नाता कुटुम्बहरु भिक्षु संघमा आबद्ध हुन आतुर थिए तर बुद्धले केहिलाई मात्र भिक्षु संघमा प्रवेश गराए र बाँकि रहेकाहरुले आफ्ना पारिवारिक जीवन जारी राखे र त्यस समुहलाई “स्थारु” अर्थात “थारु” भनियो । सिंह, (२०१३) उत्पतिः थारुको उत्पतिके बिषयमे बहौत धार्मिक ग्रन्थ आ लोक खिसामे बखान करलछै त वैज्ञानिक हिसाबसे सेहो थारु एक आदिम/ प्राचिन मानव चियै से साबित भ्या गेलछै । वेद शास्त्र मुताबिक किँरात सङे सङ थारुवोके उत्पती भेलै माननेछै । शिवपुराणमे अधारित खिसा, महाभारतके किंरात पर्वके अध्याय २८ दे ३१ तैक, शिव पुराण ज्ञान संहिताके अध्याय ६५-६७, अग्नी पुराणके अध्याय ६-१० और अध्याय ३१०-३१४ तथा ऋग्वेदके दशम मण्डल ४ वर्ण मुराबिक किँरात आ थारु क्षत्री चियै । तैहनङ दिघकाय और सुमंगल बिलासिनी नामके प्रसिद्ध बौद्ध धर्म ग्रन्थोमे थारुसबके पुर्ख्यौली आ उत्पति थलो जम्बुदिप खण्डके माननेछै । इतिहास शिरोमणी बाबुराम आचार्य, डा.गोपाल गुरुङ, इतिहासकार जनक लाल शर्मा (२००८), पूर्व महान्याधिवक्ता रामानन्द प्रसाद सिंह (१९८८), पं. गौरिशंकर द्विवेदी (१९५५), मातृका प्रसाद कोईराला (१९८६) प्राजिटर (१९२२), डा.फुहरर (१९७२), डोर बहादुर बिष्ट (१९५५), इरयान र ब्रायन हडसन (१९५७), भुलाई चौधरी,(२०६१) लखा बहौत बहौत विद्वान आ लेखकसबसे थारु नेपालके आदिवासी और तराईको मुलवासी माननेछै । चौधरी,(२०७७) वैज्ञानिक तथ्यके विश्लेषण करनेसे इटालियन वैज्ञानिक टोरेनाटो एट अल (१९८८), सकाइ एट अल (२०००)से थारुसवके थलास्सेमिया अनुवंशिक उत्तपरिवर्तन (Genetic maturation) हैले कम्तिमे हजारौ हजार बछर मलेरिया ग्रस्त क्षेत्रमे रहल रहबाके चाही । मानवके (Mitochondrial) एम.टि.डि.एन.ए. के जातिय बिस्तार (Ethinic Radiation) एशिया चुरे श्रृङ्खला (Shiwalik Hills) से भेल छै । ओकर समुहसे थारुसबके अणुवंशानिकके अध्ययन करैत १३ टा एम.टी. डि.एन.ए. जिनके परिक्षण करलकै ५ टा जिनसब पुरना आ ८ टा जिनसब लवका भेटल छेलै । पुराना ३ टा जिनसब ओरिएन्टलके (चिनी, जापनिज) रहै त दुईटा जिन अति पुराना Hapa I/HapaII मोर्फ (Morphl) रहै, जे सम्भवत आदिपूर्व मानव (Early Homo Sapiens) मे मात्रे पावल जाइछेलै जे ३ लाख से ४० हजार बर्ष पैहने रहैछेलै । थारुसबमे ३ किसिमके एहेन जिनसब भेटलै जे कि बुटवलके तिनाउ लदिमे भेटलहा रामापेथिकके लगके थारुसब मात्रे भ्यासकैछै । डा. एस.डी. कौशिकके मुताबिक ११ मिलियन बर्ष पुरना रामापेथिकके सन्तानेसब ७ लाख बर्ष पैहने थाइल्याण्ड हैत जावा आ ५ लाख बर्ष पैहने पेकिङ पुगल रहै । हाल पेकिङ मानवके पुर्ण मानव मानल जाइछै । चौधरी, (२००८) तराई आ चुरे खण्डके बहौत ठाम जेना दाङ्ग उपत्यकाके उत्खनन, लुम्बिनी, पर्साके पर्सागढी, बाराके सिम्रौनगढ, सप्तरीको चनरभोगा,कनकपट्टी, अगिनसाईर, गोरमुराईन, कञ्चनपुर, उदयपुरके मुरगरा लगायत क्षेत्रके उत्खनन आ ओइसना भेटलहा पुरातात्विक चिजबिजसे सेहो एकरा थप पुष्टी करनेछै । महामानव बुद्धके जलम थारु समुदायेमे भेल रहै सेबात बहौत किसिमके खोज अनुसन्धानसे साबित भ्यागेल छै । तत्कालिन श्री ५ को सरकार संचार मन्त्रालय, सूचना विभागले २०३१ सालमा प्रकाशन गरेको मेची महाकाली नामके किताबमे थारु बसोवास करलहा जिल्लासबमे थारुके आदिवासी आ मुलवासीके रुपमे माननेछै । नेपालके संविधान आ कानूनोसे थारु समुदायके अलगे रुपमे सम्बोधन करनेछै । थारुके आपने इतिहास,भाषा, संस्कृति, भेषभुषा, धार्मिक आ सामाजिक रितिरिवाज और पहचान रहल छै । आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठान ऐन, २०५८ को अनुसूची-२ मे थारु सुचिकृत केनेछै, त थारु आयोग ऐन, २०७४ को दफा २ (घ) मे थारु समुदाय भन्नाले थारु आयोगको सिफारिसमा नेपाल सरकारले परिभाषित गरेको आदिवासी थारु सम्झनु पर्छ भनि परिभाषित गरेको छ । थारु नेपालके दाङ देउखुरी, कपिलवस्तु, सुर्खेत, उदयपुर उपत्यका सहित पूर्व झापा से पछिम कञ्चनपुर तैक थारुसब तराईके प्रथम वासिन्दा, मूलबासी, आदिवासी जनजातिसब चियै सेबातमे कोनो शंका नैछै । (थारु इतिहास अध्ययन प्रतिवेदन, २०८०) भाषाः थारुसबके बोलैवला भाषा थारु भाषा चियै । नेपालके जनगणना २०७८ मे थारु मातृभाषा बोलैवलाके संख्या १७,१४,०९१ (५.८८%) रहलछै । राना थारु मातृभाषा बोलैवलाके संख्या ७७,७६६ (०२७%) कैरके कुल थारु भाषा बोलैवलाके संख्या १७,९१,८५७ (६.१५%) रहलछै । तराई थरुहटमे छरिय्याल रहल थारुसमुदायके भाषामे ठाम ठाममे दोसर भाषासबके प्रभाव परल देखाइछै तैसे वोलीचालीमे सेहो कुछ फरक परलछै महज थारुसबके मौलिक शब्दसब सबथारुके एके रहलछै । थारु आयोगसे प्राकशन करलहा थारु लोक गीत मोट्रीमे रहल थारु लोक गीतके शब्दसब से देख्या सकलछै । २००५ सालमा स्थापना भेलहा थारु कल्याणकारिणी सभाके मुख पत्रके रुपमे प्रकाशन हैत आइब रहल थारु संस्कृति पत्रिकोसे प्रमाणित हैछै । त थारु भाषामे प्रकाशन भेलहा शब्दकोष से सेहो बुझहल जाइछै । थारु आयोगसे थारु कल्याणकारिणी सभाके सहयोगमे थारु समुदायमे प्रचलन रहलहा थारु भाषाके प्रकारसव पहचान कैरके थारु मानक भाषा बनाइले २०७८ साउन ३१ गते से भादो २ गते तैक भेलहा “थारु भाषा मानकिरकण कार्यशाला गोष्ठी”से १२ बुँदे लेखन निर्देशिका पारित करने रहै । ओहै पारित भेलहा १२ बुदाँके मुल अधार ल्याके अखने थारु भसा साहित्य केन्द्र नेपालसे थारु आयोगके सहयोगमे परामर्शदाता संस्थाके रुपमे थारु भाषा मानक लेखन निर्दैशिकाके अध्ययन काममे लागलछै । थारुसबके मातृभाषा थारु भाषा चियै । थारु आयोग, (२०७८) सामाजिक रहनसहनः सामाजिक हिसाबसे थारु समुदाय जरमे (सयुक्त परिवार)मे रहैछै । समुह बाइन्हके लगे लग घर बन्याके गाममे रहैछै । दिगो विकासका लक्ष्यका मुख्य सूचकहरुका आधारमा थारु समुदायको समग्र अवस्थाको अध्ययन प्रतिवेदन मे ५ आ ओहौसे बेसी परिवार सदस्य रहलहा थारु घरपरिवारको संख्या ५९ प्रतिशत देखाइने छै । घर मुलीको रुपमा पुरुष रैहतो भि घरके काममे जनिजाइतोके (महिला) बराबर हक आ अधिकार रहैछै । जलमसे मरन तैक थारु समुदायके आपन अलगे संस्कार आ किरियाकरम रहल छै । थारुसवके परम्परागत संस्कारमे थारु समुदायके अगुवा, घरके मुली, गुरुवा आ अगुवा महिला तथा मरदपुरुषसे बेसी से बेसी करैछै पाछे थपलहा संस्कारमे पुरोहित लगाइके चलन सेहो रहल छै । थारुसव वैशाखसे ल्याके फागुन तैक बहौत किसिमके पाबैनसब मनावैछै । वैशाखके लबका बरसके शुरुके महिनाके रुपमे मनाइवला थारुसबके पावैन १/२ गते शिरुवा/जुरसितलसे शुरू भ्याके फागुनके फगुवासे ओराइछै । थारु समुदाय मुल पावैनके रुपमे सिरुवा, अखारही(जात), बडका रैव (अटवारी), नेमान, चौठीचान, जितिया, सुकराती, समाचकेवा, यमोसा, तिलासंक्राइत/माघी, गुरही लखा पावैनसब रहलछै । माघीयो थारुसब आपन तरिकासे लवका बछरके रुपमे मनाबैछै । खेती किसानी करैबला थारुके घरमे माघ महिनामे धाने धान रहलाके चल्ते । कामके बदलामे धान, सेवाके बदलामे धान दैके चलन रहै तहौसे माघीके लवाका बरसके रुपमे मानैछै । नोकर चाकर राखैके, लवका करार करैके । बार्षिक रुपमे दोसर समुदायके कामके बदला खन, कामदारके कामके बदला दरमहा चुक्याके हरहिसाव फर्छौट करैके समय सेहो चियै । कामदारके खुशीसे मनोरञ्जन या नाचगान खान पान करैके सहि समयो सेहो माघ चियै । आपन बहैन बेटीके मैहनो दिन तैक मोटाके मोटा सनेस पठाइबला समय सेहो चियै । थारुसब बहौत किसिमके उत्सव, पाबैन, खुशी आ दुख दरदमे किसिम किसिमके गित गाबैछै, नाचगान करैछै । थारु नाचके कतहेक गितके शब्दसब एके रहै छै महज समय आ पहर मुताबिक ओकर तरजमे फरक हैत जाइछै । थारुहरु धुमारा, सोरैठ, जटाजाटिन, चोरखेली, सखिया, मान, हंसराज बंशराज, सखिया, लाठी लखा नाचसब करैके चलन छै । गित आ फरक संगितके रुपमा बिरहैन, चाँचैर, बरमसा, पराती, बसन्त, भगैत, समघौन, सजना, करनौती, भिभास, होरी, विवाह, किर्तन लखा अलग समय आ उत्सवमे अलग अलग गित गाबैके चलन रहलछै । पेशाः थारु समुदायके मुल पेसा खेतीकिसानी चियै । त्रिभुवन विश्व विद्यालय मानवशास्त्र विभागसे करलहा “नेपाल समावेशी सर्वे २०१८” मे ९९ प्रतिशत थारुहरु सङे जमिन रहल देखाइनेछै त ३५ प्रतिशत थारुसब दोसरके जमिन अधियामे कम्याके खाइछै । जेकि दोसर जाइतके तुलनामे बहौत बेसी छै । ओह्य सर्भेसे ७० प्रतिशत थारुसब खतिकिसानी पेशामे जोरलछै से जनेनेछै । थारुके मुल पेशा कृषि(खेतिकिसानी) चियै तैयो खेति किसानीके साथे साथ दोसरो घरायसी आ सामाजिक कामके लेल बहौत किसिमके समानसब थारु अपने इलमसे बनाइत आबैछै । जेना- घरायसी हथियार आ समानसब, घर बनाइले काठ बाँस लखा समानसे घरमे लागैबला केबार, चोकैठ, खिरकी, घरैन, पाइढ, सनुख, अनमारी, बिरिज, भखारी, धमा, ढकिया, ठेक, हर, गरी लखा बहौत किसिमको समानसब आपन जरुरीके देखके उत्पादन करैछै । सामाजिक संस्कार आ नाच गानले मृदङ्ग, ढोलक, डम्फा तैहनङ माछ मारैले जाल बनेनाइ लखा बहौत किसिमके काम करैछै महज इ कामसबके व्यवसायके रुपमे कनहिके लोकसब अपनेनेछै । जरुरी परलापर थारुसव डकर्मी, सिकर्मी लखा बहौत पेशासबमे थोरबहौत लागलछै । शिक्षा आ विज्ञान प्रविधिको विकास संगसंग थारुसब ब्यपार व्यवसायके साथेसाथ और दोसरो वौद्धिक पेशामे सेहो आपन पहौंच बढह्या रहलछै आर्थिक अवस्थाः बुद्धके पालासे पैहने थारुसब तराईके राजा, भूमिपति आ शासक रहै । उसब आर्थिक हिसाबसे करगर रहै । महज रसेरस कमजोर हैत येलै । खेतिकिसानी मुल पेशा रहलहा थारुके जग्गा जमिम रसेसर घटैत गेलै । उब्जामे कमि एलाके चल्ते जिवन निर्वाह करैके रुपमे खेती रैहतो भि खेती बेपारीक आ आधुनिक हिसावसे नै भेलाके चल्ते सालो भैर परिवारके गुजारा करैयोमे कठिने छै । समावेशी सामाजिक सर्भे २०१८ मे थारुसब १३.५ प्रतिशत गैह्र कृषि क्षेत्रमे और १७.५ प्रतिशत जन बोइनमे देखाइनेसे एकर थप पुष्टी करैछै । उ सर्भेसे राष्ट्रिय औसतसे कम अर्थात ५८.८ प्रतिशत थारुसबके बैक तथा बित्तिय संस्थामे खाता रहल जनाइने छै । यहौसे थारुसबके आर्थिक अवस्था कमजोर रहल देखाइनेछै । धर्म संस्कृतिः थारुसब प्रकृति पुजक समुदाय चियै । इ समुदाय उपवास आ ब्रतमे विश्वास करैछै । प्रकृतिसे उपहारके रुपमे पावलहा जमिन, पाइन, आइग, आकाश, सुरुज, चना, लदी, गाछबिरिछ, बोन, दह आ अन पाइनके साथै साथ जिव जन्तु चिरैचुरकुनीके पुजा करैछै । थारुसबके घरके देवता, डिहबार, ग्रामथान, बह्रमथान, सिराथान लाख गहबरमे कोनो किसिमके आकृति नै रहैछै । ठाम ठाममे बहौत किसिमके देवी देवतासब घरके देवताके रुपमे माइतो भि आपन पुरखाके सेहो देवताके रुपमे पूजा करैछै । सैब घरपरिवारमे निक बेजा बुझहैले आ झारफुक करैले पतियौर, गुरुबा, बैद्य, धामीयो रहैछै । थारुसबके धरम प्रकृति रहलो पर समयके बदलावसङे बहौत कालखण्डमे आन आन ठामसे एलहा लोकसबके संगतसे दोसरो धरमके प्रभाव परलछै । थारु समुदायके परम्परा एवं रीतिरिवाजसब बौद्ध संस्कृतिका अवशेष चियै । उसब अन्जानमे आ प्राचिन अतितके ज्ञानके अभावके चल्ते अपनाके हिन्दु भेलहा नाटक करैछै । टिसा कश्यप उल्लेख करनेछै कि बुद्धिष्ट आ थारुसबके रीतिरिवाजके बीचमे कोनो फरक नैछै । हमरा बिना सन्देह कहैले परैछै कि उसबके हिन्दुकरण करलो परभी कहियोने हिन्दु संस्कृतिके आपन हृदयसे अंगिकार करैले नैसकल्कै । सिंह,(२०७०) बहौत लोकसब धरमके नाममे हिन्दुके स्विकार करल्कै, मगर ओइसबके परम्परा, चाइलवाइन, रहन सहनसे उसब बौद्ध धर्मसे लग देखल जाइछै । थारु समुदाय, सिधा, झुठो नैबोलैवला, जे देखैछै स्यहा स्विकार करैबला, छोट नान्ह बातमे ओतहेक ध्यान नैदैबला, अपना कनहिक दुखो सैहके दोसरके चित बुझहाइबला स्वभावके रहैछै । थारुसब समयके बदलाव सङे सङ अपनाके बदलैले नै सकल्कै । जेछै ओहैमे खुश रहैबला थारुसब समयके माग मुताबिक अपनाके बेमान, असती, भ्रष्टाचारी, चोरी, ठगी लखा छट्टुके मारमा परैत गेलै । अखने थारु समुदाय आपन संस्कृति परम्परा आ पहचान जोगाइले संघर्ष कैररहल छै । थारुके पैहने छुट्टै गणराज्यसब रहै । आपने शासन ब्यवस्था आ प्रशासनिक विभाजन सेहो रहै । समयके उतार चढाव और व्यवस्था परिवर्तन सङेसङ यैमे कमि हैत गेलै आ राजनीतिकरुपमे सेहो कमजोर हैत अखैन राजके मुल तहमे ओकर कोनो किसिमके पकर नै रहलै । नामेटाके रुपमे छेबो करै त निर्णायक आ नीति निर्माणके तहमे पुगैले नै सकलछै । संविधानमे घर्म निरपेक्ष राज्य कहल गेलछै तबो अघोषित रुपमे हिन्दु धर्मके दोसर धरमके तुलनामे सरकारी स्तरसे बेसी संरक्षण आ सम्बर्द्धनके व्यवस्था करल जाइछै । थारुसब स्वभावेसे प्रकृति धर्म आ बुद्ध धर्म धारण करनेछै महज हिन्दु धर्मके दवाव, प्रभाव, प्रलोभन आ अज्ञानतामे पैरके बाहिरीरुपसे हिन्दु घारण करलो पर वास्तवमा थारुसब बुद्धके सिद्धान्तके बेसीसे बेसी अंगालने छै । जनगणनासे देखेलहा ८१ प्रतिशत हिन्दुके संख्या सहि नै चियै । सरकार आ सत्ता २००७ सालसे पैहने तराईमे थारु बिना राज्यके कोनो काम नैचलै छैलै । महज २००७ सालके बाद राज्यके थारुसबके आवश्यकता नै परलै । गामघरके धनीक मनिक थारुवेसब राज्य आ जनता बिचके मध्यस्तकर्ताके रुपमे रहै । ओह्यासव राज्यके कर उठाबै, छोट- छाट झगडा मुद्दा देखै या बहौत किसिमके प्रशासनिक काम सेहो करै । इ काम प्रगन्नाके चौधरीसब करै छेलै मजह कर प्रशासनमे जहियासे कर्मचारीतन्त्रके प्रयोग हेबे लागलै तहियासे शक्ति आ पावरके लग रहलहा पहरियासबके फाइदा भेलै आ इ ब्यवस्था थारुके कात करल्कै । (गुणरत्ने, २०६०) इ बात थारुसब समय समयमे सेन कालसे ल्याके राणा कालतैक पाबलहा बहौत किसिमके लालमोहर, स्याहा मोहर और ताम्रपत्रसे बुइझ सकैछै । Gisele,(2000) यहौसे नेपालके राज्यसत्तामे थारु कोनोने कोनो हिसाबसे रहबे करै आ देशके लेल आपन योगदान दैतै एलछै से साबित हैछै । अखैनका राज्यसत्ताके देखल जाउ त संघीय संसदके कुल २७५ सिट संख्यामे १५ टा थारु मात्रे छै । राष्ट्रसभामा कुल ५९ सिट संख्यामा मे १ जना मात्रे रहलछै । नेपालके सातोटा प्रदेशके कुल प्रदेश सांसदसबके संख्या ५५० मेसे कोशी प्रदेशमे ३ गोरे, मधेश प्रदेशमे ८ गोरे, बाग्मती एकोटाने, गण्डकी प्रदेशमे एकोटाने, लुम्विनी प्रदेशमे १३ गोरे, कर्णाली प्रदेशमे एकोटाने और सुदूरपश्चिम प्रदेशमे ७ गोरे कैरके ३१ टा प्रदेश साँसदसबके उपस्थिती रहलछै । तैहनङ ७५३ टा स्थानीय तहके प्रमुख और अध्यक्षमे २८ गोरे, उप-प्रमुख आ अध्यक्षममे ५० गोरे रहलछै । ६७४३ वडा अध्यक्षमे ३२६ टा थारुसब वडा अध्यक्ष रहलछै । थारु आयोगसे निकाललहा थारु स्मारिका, २०७९ मे थारु समुदायके संख्या निजामती सेवामा ०.४१ प्रतिशत, नेपाली सेनामा ५.८७ प्रतिशत, नेपाल प्रहरीमा ५.३८ प्रतिशत, सशस्त्र प्रहरी बलमा ६.४७ प्रतिशत, शिक्षा सेवामा १.५५ प्रतिशत, न्याय सेवामा ०.६५ प्रतिशत थारु कर्मचारीहरुके उपस्थिती रहलछै । थारु स्मारिका, (२०७९) थारु समुदाय नेपालके सबके पुरान समुदाय चियै । एकर आपने भाषा, संस्कृति रहन सहन, रितिरिवाज छै । आपने पहचान छै । महज इ समुदाय अखैन आपन पेरा भटैक गेलछै । समयके सङे सङ अपनाके प्रतिस्पर्धामे उतारैले नै सैक रहलछै । आपन संस्कृति से बेसी बिकृतिमे लागलछै । अखैनका समय खास क्याके थारु युवासबके आपन पहचान सहैत शैक्षिक क्रान्ती, आर्थिक क्रान्ती, सामाजिक उत्थान, शिक्षा या प्रबिधीमे प्रतिस्पर्धा करैके क्षमता विकास करनाइ जरुरी छै ।
सन्दर्भ सामग्रीसबः-
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