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जग्गा दाता

हाम्रो बारेमा

दुई शब्द / बिचार

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सर्व प्रथम अपन वशांवली चौधरानके दिवांगत पूर्वज पुर्खा सवमे हार्दिक श्रद्धाञ्जली अर्पन करैची । वंशावली किताव सर्व प्रथम २०५५ साल चैत्र १५ गते वुधबारके दिन सब दियादवादके हातमे परसल गेल किताब तकर पश्चात बौहत दिन साल कोनौ खोजखबर नै भेलाके कारण हमर पुष्ता एवं नयाँ वंशके किताबमे सुचिकरण समावेश नै भेलासे समय दिन परदिन समस्या अगाडि बैढते गेल । समय ककरो प्रतिक्षा नई करैछै । आई हम चिएइ काइल नै चिएई दंशावली समयके साथ साथ अगाडि बैढते जेतैई ओकर निरन्तर विकासके क्रम अगाडि चैलते रहतई मगर वंशावली किताबमे हमर नाती/नातीनी, काका/काकी, छौवा/पौवा, सबके नाम नै रहत त पछाडी पैरजेवई । हमर वंशावलीके प्रगतिमे वाधा परत यकर निरन्तर १० साल के वाद फेरसे किताबमे नाम समावेश करेपरत आई २४ साल के वाद दोसर संस्करण त्यार भेल कारण हमही सब चिएई २४ साल तक एक दोसरके मात्र दोष दइतरहल । धन दौलत शिक्षा हासिल करैगेल मुद्धा वंशावली तर्फ ककरो ध्यान नै गेल तई दुवारे किताबमे बहुत आदमी सबके नाम समावेश नई भेल छेलै । वशांवली के क्रम जारी राखैय परत नैत अपन संस्कार, पहिचान, सांस्कृति, धर्म, भेस-भुषा, खानपिन, ई थारुके पहिचान चिएई । अपन भाषा, सांस्कृति के पहिचान हेतु एक जुट हेवे परत हम सव एक दोसर के अधिनमे राजनितिक सवालमे चिएई । लेकिन कहिया हमर सबके मुक्ति हेतय कतहेक दिन दोसरके मुख देखबैइ । अकर लेल हम सबके सोचे परत, विचार करै परत, संघर्ष करे परत ई अपन संघर्ष क्रान्ति, एकता, विचार, अध्यन अति महत्वपुर्ण जरुरी छै । सतावदी- सतावदी अई देस नेपालमे बसोवास करैत पूजा करते आवैची लेकिन थारु झन-झन पछाडी परल चियई यी कारण हमरा लगइये-राजनितिक चिन्तन, अध्यन, समय सापेक्षमे पढाई नोकरी देसके सम्पूर्ण सेवामे पछाडी परल चि । क्यो विद्धवान कहलक थारु त आदिवासी चियई वर्षों वर्ष थारु सब नेपालमे बसोबास करैत एल । यहा बातसे थारु सबके मनमे खुशी भइरदैय लेकिन आदिवासीके बारेमे बोलैंय । थारु पछाडी छै । ओकर जिवन कठिन पे कठिन भ्यारहल औछ नोकरीमे देसके महत्वपूर्ण सेवा से वनचित छै । यी विद्धान वा राजनितिक व्यक्ति सब नै बोलते क्याके त थारु सव यह देसके भोटर मात्रै चियइ । अधिकार नोकरी सरकारी नोकरी देवैय त हमरा सवके खाना के देतय कमैया सव न चिएय । थारु जाइतके दारु और मासु दियो ओर भोट लियो । आई तक थारु सवके ई करलौं । अपन संस्कार भुलाएके दोसर के गुलामी करु तई वातमे हमर पूर्वज थारु सव लगल चि थारु सब पछाडि हइके बोहोत कारण चिएइ । बहुत लिखलासे थारु सव गलत बिचार करतै तइ दुवारे अपन कलमके नोक से छोटकरी मे लिखलौं । हम सब यी धरती के पुत्र चिएय । अधिकार सम्मान के लेल क्रान्ती, विचार, एकता नई करव त अपन पहिचान के इतिहास गुईम जायत । जैसना सम्मान अधिकार जिवनके लेल महत्वपूर्ण चिएय अकर अगाडिमे जिवन कोनौ महत्व नै छै । अन्तयमे हम याहा कहब जीवन त एक दिन अन्त हेवे करत लेकिन छातिमे हात राईखके कहु हम सब थारु चिएय । थारुके जिवन कमैया आदिवासी नै चिएय हम संब यी अइ धरतीके पुत्र चिएय तै कारण पे देसके नागरिक के हेषियत से थारु सबके देसके हरेक सेवामे ओतवेहेक अधिकार चिएइ ।

वासु चौधरान

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लगभग ८२४ वर्ष अगाडी बृज पितामह वौन भरारी नारायणके चौधरान परिवारमे वासु चौधरान (थारु) नामक व्यक्तिके जन्म भेल छेलै । वालकालके उमेर से उ सहासी और ज्ञानी तथा धर्मप्रति आस्था एवं विश्वास रखैवाला धर्मालम्बी व्यक्ति छेलै । अन्दाजी १२ वर्षके उमेरमे सप्तरी के फलही फौट गाँउ मे वहुत भयंकर रोगव्यधि के पकोपचल्लै। वयै समयमे बहुत से आदमी और पशु-पंक्षी (गाई, भैसी, बाखा, परेवा, आदि) के मैरगेलै गाँउके आदमी सब रोग व्याधि के शान्त और हटबैकेलेल धामी झाक्री चिकित्सव एवं मवेशी चिकित्सव के आइन के झारफुक कराइलक और चिकित्सवसे औषधी मूलो करायलक फिरभी नै ठीक भेल । गाँउमे बहुत वडा हा-हाकार मैच गेलै । गाँउके आदीसव घर छाइडके वालवचिया सहित भगा भाग भ्यागेल छेलै ।
वही समय मे गाँउवाला सबके मालुम भेलै जे चौधरान परिवारमें वासु चौधरान (थारु) नामके व्यक्ति छैय जे थोर बहुत जानै छै । गाउवा सव वासु चौधरान लग ऐल और अपना दुखनामा सुनाइलक और अपन गाँउ ल्यागेल ।
धर्मराजके पुजारी वा सेवक वास चौधरान के राइतमे धर्मराज सपन देलक कि हमरा नामसे पूजा-आजा करतै त ठीक भ्याजे तै। तव वासु चौधरान वै गाँउवासी के बिहानके वोलाइक ओर कहलक धर्मराज के पूजा-आजा के सामान अच्छत, पान, फुल, लडू, सुपारी जम्मा करैकेलेल कहलक और साथ- साथ ईनार भी खनैकेलेल कहलक । यी वात सुन्तेह दुख-धर्म से पिडित गाँउवासी सव तुरन्त ईनार खन्नलक और पूजा आजाके सामान सव जम्मा कैर के वासु के दलक । धर्मराजके पूजारी वा सेवक वासु एक जगहमे पूजा - आजा नियम पूर्वक कैरके अच्छत, पान, फुलसब गाँउ वस्तीके देलक और कहलक यी अच्छत, सबके उपरमे छिटदाव और ईनारके पानी पिएवा तैहै दिनसे रोग व्याधि सब हैटगेलै ।
महामारीरोग व्याधि के हटवै वाला महा पुरुष धर्मराज के पुजारी वासु चौधरान छेलै । यी रोगव्याधि वैशाखं १गते हटलै। तैद्वारे गाँउवासी सब वासु चौधर

भोज चौधरान

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अन्दाजी करिब ८२४ वर्ष पूर्व चौधरान परिवार में भोज चौधरी नाम के व्यक्ति के जन्म भेल छेलै । ऊ वालककाल से नै बहुत निडर, साहसी ओर लडाकु छेलै । जंगली जनावर (हात्ती, वाघ, भालु) सवसे वकरा डर नै हैय छेलै । तही समयमे जंगली हात्ती सव जेरके जेर (ग्रुप-ग्रुप) धान खाइले आवै छेलै । हात्ती सव के भगाई के जिम्मा अर्थात धानके रखवाली के जिम्मा दोसर कोनो व्यक्ति नै करेसकै छेलै । धा वाली खाइवाला हात्ती सबके भोज चौधरान अकेले रेबाइर दैछेलै ।
उनकर साहस और विरता देखके तत्कालिन शासन बहुत खुश भेल और उनका खाई के लेल कटहा जिलाईत मे ७-०-० सात विगहा के एकेटा प्लोट ईनाम बक्स दायलगेल और साथ -२ चौधरान पद सोहो दायल गेलै । किच्छु समय के वाद एकदिन राइत मे सुतल अवस्थामे अचानक हात्ती सव आबगेलै और वकरा दाइव के माइर देलकै । मरैतकला भोज चौधरान कहलकै जे आइदिन से कोनो हात्ती धान वाली खाइले नै एतौ । तैद्वारे हमरा आइदिनसे पूजा देवेपरतौ वहै दिन से भोज चौधरान के नामसे पूजा देवैके प्रचलन भेलै । कटहा जिलाइत गोरछारी गाँउ के अन्दर सात ७-०-० सात विगहा के भितर एक भिड छैय जे अखन तक कोनो हात्ती वे भिडमे नै भिडैय छैय । जे एतिहासिक प्रमाण छै जन विश्वास छै । पूजा पाठ धान रोपाई और कटाई के समय वर्ष मे दुई चोटी हैयत आइवरहल छै ।
अखनतक यि ७-०-० विगहा के अन्दर कटहा जिलायत मे भगवानपुर रोड के सटले छैय और भोज चौधरान के नाम से यि कित्ता प्रख्यात छैय ।

 

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धर्मराजके सेवक चौधरान बंशावली

राष्ट्रिय समिति, नेपाल

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