धर्म संस्कृति और परम्परा कोनोभी जाईतके खन्दान आ वंशके पहिचान चिये। धर्म संस्कृक्तिके लोप हैंते कोनोभी खन्दान आ बंशके पहिचानमे प्रश्न उइठ सकैछै। तही दुआरे अपन धर्म संक्ति और परम्पराके संरक्षण आ सम्बर्द्धनके बात करैत हमरा बहुत गर्व महसुस भ्यारहल आईछ ।

जातिय धर्म और संस्कृतिके सन्दर्भमें हमसव थारु चियै। यि थारु शब्द थारु जाईतके इतिहास सो हो बतारहल याईछ। तै दुआरे थारु कहैत हमरा गर्व महसूस भ्यारहल याईछ। चारु शब्द "था+रु" यी दुईटा अलग अलग शब्द मिलके बनल है। जकर अलग अलग अर्थ है "था = छेले , रु = प्रकाशमान" हैछै। यी दुनु शब्दके अर्थ एक जगहमे मिलेलासे हैछै थारु जाईत आदीकालमे प्रकाशमान रहै, तेही दुआरे थारु कहैत हमसव के खुशी लागैये। थारु बंशावलीके हिसाबसे "बिलु गंगाराम" अर्थात "वरियार" खन्दानके बृज पितामह पूज्यवर श्रद्धेय स्वर्गीय श्री बरियार माईझके जेठका लरका आदि लौहपुरुष महामानव माने माइक 'गणराज्य" व्यवस्थाके मानराजा रहै से बात ११ माँ पुस्ताके जिल्ला सप्तरी ग्राम मधुपट्टी निवासी श्रद्धेय स्वगर्गीय श्री पन्चुदास दूरा बोलत रहे। जे बरियार बंशके सम्पूर्ण इतिहास अपने खुह से बतेने रहे। परापूर्व कालमे शिक्षाके अभावके कारण हमर पूर्खा सब अपन बंशके इतिहासके वारेमे बैज्ञानिक खोज तलास आ उचित विचारके विकास नई क्यासकलकै । ताब ई सम्बन्धमे कोनोभी लिखित प्रमाण नै प्रकासित क्या सकलर्क। एकर परिणाम आई हमरा सबके अपन बंशके बारेमे बहुत कम जानकारी है।
बास्तबमे खोजतलास करलापर पूर्व मेची से पश्चिम महाकाली लगायत चम्पारण गोरखपुर, कुमाउ, गडवाल सहित तराईके सम्पूर्ण भू-भागमे बारु सबके गणराज्य व्यवस्था रहै। यि बातके समर्थनमे बुद्धदास भिक्खु नामके बौद्धिष्ट कहने रहे कि प्रागैतिहासिक कालमे हिमालके निचला फाँटके जबमुद्धीप कहै छेले -बोई जगहके छोटका बरका अधिराज्य सवमे राजा सव आ गणराज्यसवमे गणपति सव शासन करैछेलै । तेहनेग अनुसंधान कर्ता राई डेभिड कहने रहे कि कपिलवस्तु दिसनके जंगल आ जमिनमे अधारीत शास्य गणराज्य चलल खेले। शाक्य किसानके राज्य छेलै आ अगुवाके चुइनके राजा बनावै छेलै । शुद्धोदन येहनग किसिमके राजा छेलै । आ भावदत नामके विद्धान कहने छै कि पहिने थारु गाणराज्य रहे मुकुनदसेन प्रथम थारु सबके प्रमुखके नोकरी करने रहतै। थारु बिज्ञ महान्यायधिवक्ता रामानन्द प्रसाद सिह सोहो करने रहे"मेचिसे लके महाकालीतक सख्वाके जगल भितरमे खेती कैरके रहेवाला थारु सव बरका जमिनदार सब रहै। गणराज्य शासन व्यवस्थाके आधारमे राजा चुनै छेलै । औरो प्रमाणके आधारमे माने माईक बरका जमिनदार रहे। गाणराज्य व्यवस्थाके आधारमे चुनलाहा तिरहुत राज्यके गदी चौरासीबाला राजा रहे । माने माइक अपन बिद्धता, सहासी, उच्च बिचार, लोकल्याणकारी, सत्यबादी, पैयवान, समाज सेवा, काम कर्तव्य चातुर्य, कलाकृति आ दैविक शक्ति और अलौकीक ज्ञानके प्रभाबसे मानराजा भेल रहे। ५००-६०० बर्ष पहिनेके सत्य तथ्य प्रमाण सवसे प्रमाणित हैछे। माने माईझके बृज पितामह वरिवार माईक पश्चिम नेपालके तराई क्षेत्रसे पूर्वी नेपालके तराई क्षेत्रमे सरैत असैत एलै । यह बंश कुल खनदानके महाप्रतिभा शाली माने माइक नेपाल तराई क्षेत्रके पूर्वी भागके सम्मतल और धना जगलमे आईसके बैसले और और लोग सबके बसेलके। ऊ बीई जगनके काईट काईट के (फडानी) कैरके सफा करेलेकै नौर खेती योग्य उर्वरा जमिन बनीलकै। उ एकटा बहुत बरका भुमीपति और प्रभावशाली व्यक्ति बेलासे अपन नामसे मिलैत जुलैत एक सुन्दर माननगर गाम बसेलकै। जे गाम अखन सप्तरी जिल्ला के भाग्यमे रायझमूना प्रगन्ना अन्तंगत परैछे।
माइझके बंर्थ हैछै "गामके अगुवा, प्रतिष्ठित व्यक्ति, जमिनदार यत्तवेक नै पहिनेके समयमे तरई क्षेत्रके पारुसथ राज्य करैछेले अर्थात बारुसव राजा छेलै ।" माने माइक १८ हाथके मुरेठा, कोचावाला धोती, बांहू कट्या कुर्ता लगाबै छेलै । बरका करिया रंगके भोटिया धोरामे चढ़ छेले त लागे छेले मगल पैठान जैसन। यि बातके बारु लोक गित से प्रमाणित है है "हमर बलम जी के लटपट पगिया, जैसन चने मुगन पैठान। यी गीत चारु जाइतके पगरी मुरेठा बन्दैके संस्कारके प्रष्ट करैछ। पारु जाईतमे मुरेठा, पाग पगरी बान्नैके प्रचलन महाराना प्रतापसिंह और क्षत्रपति शिवाजी नहाइत राठौर बंशीय राजपुतनाके खन्दानसे एलई ।

१४ औ शताब्दी के मध्यकालमे पूर्वी नेपालकै सिमरीन गडके कनांड बंशीय दनुवार राजाके सातबा सुस्ताले राजा हरिसिह देव छेलै । हरिसिह देवके समयमे मन्त्री मंडल गठन करके परम्परा कायम छेलै । इनकर मन्त्री मंडसके प्रधान मन्त्रीमे चन्देश्वर ठाकुर छेलै । राज पण्डितर्क रुपमे कवि ज्योति श्वर इले। माने माईक एक्टा बरका भूमिपति भेलासे राजा हरिसिंह देवसे आर्थिक और राजनैतिक रुपमे धनिष्ट सम्बन्ध छेलै । पांचवा पुस्ताके राजा रामसिह देव द्वारा विजारोपण केलहा चौधराई पटवारी प्रचाके आधारमें माने माइक्रके राजा हरिसिह देव चौघराईके जिम्मेवारी प्रदान केने छेलै । चौधरांईके नातासे राज्य सभामे आमन्त्रित करे छेलै । माने माइक्रके ईमान्दारी, चतु-यांई, बहादुरी, परोपकारी उदारवादी और धार्मिक सहिष्णुता जखा विचारसे प्रमाणित भ्याके राजा हरिसिप्त देव अपन मन्त्री मंडसमे सदस्यर्क रुपमे राखने रहे। माने माइक के हरेक चाहना और इच्चद्रा दैविक शक्तिसे पूरा छेलै । माने माइक दैवि शक्तिके लेल शक्ति स्वरुप देवी माता काली और बल बुद्धि विद्या स्वास्थयताके लेल महाविर बाबा हनुमानजीके हरेक दिन विधि पूर्वक पुजा आराधना करें छेलै ।
भाषा बंशावलीके आधारमे नोपलके मध्यकालीन इतिहासमे हरिसिंह देव सतवां पुस्ताके राजा रहे। जेकर पिता राति सिंह (कर्म सिह) देव रहे। उ कन्नड भाषा बोलैवाला मैसुर आ हैदरावाद क्षेत्रके कर्णड बंशीय दनुवार राजा रहे। बोई राजाके जेठकी महरानी ईसर बती देवीके कोखसे दुईटा लरका मानसिह देव आ श्यामसिह देव रहे । हरिसित देव प्रतापी राजा भेनासे भक्तपुरके राजा रुद्र मल्लके अपन बंशमे ल्याके हुनकर बहेन देवल देवी संगै दोसर बिवाह केलकै । देवल देबीके कोखसे एकटा सरका जगतसिह कुम्हार रहे। परिवारिक उतार चढ़ावके रूममे सौतिनके रुपने देवल देवी धरमे एलासे इसर बती देवी दुश्चित भ्याके राजधानी सिमरौनगढ़ छौरके अपन दुनु तरका संगे तिरहुत राज्यके पूर्वी सिमाना अन्र्तगत सप्तरी जिल्लाके रायझमुना प्रगनाके सुन्दर मान नगरमे आईवके बैसले।
भाषा बंशावलीके हिसाबसे नेपालके मध्यकालीन इतिहासमे सिम्रौनगढके छठवां पुस्ताके राजा शिवसिंह । शक्ति सिंह) देव महाप्रतापी छेलै । ओकर राजपण्डित महावि विद्यापति छेले और तिरहुत माईक बहुत बरका जमिनदार छेलै । यी तिनु समकालीन महापुरुष छेलै । आादी महापुरुष तिरहुत माईक गणराज्य व्यवस्थाके गादी चौरासीबाला राजा रहे। तै दुआरे शिवसिह देव तिरहुत माईकके घनिष्ट राजनैतिक सम्बन्ध रहे। समयके उत्तार चढ़ाबके क्रममे तिरहुत माईकके एकटा १०० बिगहाके पोखैर छलै। बीई पीखैरमे हुनकर वतीस लक्ष्ण गुणसे भरल पुतौह आहार- बिहार करैले गेलासे जिजिर (सिकी। पकर लेलकै। तिरहुत माईक पुतीहके नई छोरावैने सकलकै। ताब पुतोहके शोक से तिरहुत माइझ दुःखित भ्याके भारतके तिर्थ यात्रामे निकलैसे पहिने १४औ शताब्दीके मध्यकाल दिशन माने माईकके गाणराज्य व्यवस्था मुताबिक ८४ पुगन्नाके माइन्जन सबके सहमतिम गादी चौरासीवाला राजा बनौलकै ।
नेपाल मध्यकालीन इतिहास मुताबिक राजा हरिसिंह देबके शासन काल वि.स.१३५१-१३८१ साल तक रहै । समयके उतार चढावके क्रममे वि.स. १३८१ सालमे दिल्ली सम्राट सुल्तान गयासुदिन तुगलकके बंगाली मुसलमानी फौजसय तिरहुत राज्य आ ओकर राजधानी सिम्रौनगढक ध्वस्त क्यादेलकै । ताव राजा हरिसिद्ध देवके राजबन्दी बन्याके एक महिना तक पारसमणी पत्थरके लोनसे चरम यातना देलकै। तैयाने राजा हरिसिद्ध देव स्वीकारलकै । यतबेहेकमे दिल्ली सम्राट सुल्तान गयासुदिन तुगलकके मृत्यु भ्या जाइछे। ताब हुनकर लरका मोहम्मदीन तुगलक दिल्लीके सम्राट बनलै। सुल्तान मोहम्मदीन तुगलकके राजा हरिसिद्ध देवमें विश्वास भ्याजाइछै । ताम रामबन्दी मुक्त क्यारे है। तेकरवाद राजा हरिसिह देब अपन छोटकी महारानी देवल देवी राज कुमार जगतसिह कुम्हर वा मन्त्री चन्देश्वर ठाकुरके साथ प्राण रक्षाके लेल उतर पूर्व दिशन लागलै। नेपालके दोलखा जिल्लाके राजग्राम तर्फ जाईके क्रममे सिन्धुली तिरपाटा तिन पाटन में राजा हरिसिह देबके बि.स. १३८२ साल माध महिनामै मृत्यु भ्या जाइछे। तब नेपाल उपत्यकाके तत्कालिन राजा रुद्र मल्ल अपन बहैन देबलदेवी आ भागिन जगतसिह कुम्हरके दरबारमे शरण देलकै ।
सुल्तान गयासुदिन तुगलकके बंगाली मुसलमानी फौज बि.स. १३८१-१४०६ साल जम्मा २५ वर्ष तक तिरहुत राज्यममे शासन जम्याके रहलकै। बंगाली मुसलमानी फौज सबके खाईपियेके लेल जा फौजी खर्चके व्यवस्थाके मास्ते आम्दानी ओतके आवश्यकता महसुस है छे। तब आम्दानी श्रीतके रुपमे मलेरिया, बलाजार जैसन महामारी रोग भा हिंस्रक जनाबर सवसे लरैवाला संघर्षशिल यारु जाईतके इमान्दारीता कर्तव्य निष्ठता, मोकमतिया गण देखजे स्वर्गीय सुल्तान गयासुदिनके लरका दिल्ली सम्राट मोहम्मदीन तुगलक तिरहुत राज्यक रेकनरेतिकर। उठावैके वास्ते आदी लौह पुरुष माने माईकके वि.स.१३८२ साल दिशन अभिभरा सौपलकै । आ मानराजाके संज्ञा सो हो देलकै रैकर उठाय उठायके मुसलमानी फौज सबके पहुचावे लागले। ताय ८४ प्रगन्नाके मैनजन सबके सहमतिमे माने माईक राय कमुना प्रगन्नाके मैनजनके रुपमें मानसिह देवके चनलकै । माने माईकर्क ८४ प्ररान्नाके मैनजन सब मानराजा कहके पकारे लागले।
भाषा बंशावली मुताबिक शंकाराचार्यने नवीं शताब्दीके पूर्वाद्ध दिशन भारतके बौदमागी सबके खिताइरके नेपाल प्रवेश करयाके सभामे बौद्धमार्गी सबके शास्त्रसे परास्त क्याके हिन्दू धर्ममे दिक्षित करैत ८४ हजार बौद्धधर्म ग्रान्थ सब जरादेलासे बौद्ध आचार्यसव भोट दिशन शरणलैले गेलै । बोहे समय में नेपाली समाज हिन्दूकरण ऐनगेले देखापरैछे । १४ औ शताब्दी आवैत आवैत नेपाली समाजके पूर्ण रुपसे हिन्दू नियममे आवद्ध करैके अवस्था सिर्जना भ्या जाईछे । बौई बिलुप्ती कारणमे शाक्यसव भाइगके काठमाण्डौ उपत्यकामे एलै आ तराईके सख्या जंगल भितरमे खेती क्याके बैठले रहगेलहा थारु सबके हिन्दकारण क्यादेलकै । तैहसे मध्यकालमें वैष्णव धर्मके तराईमे लोकप्रियता बैढते गेलासे माने माइझ बैष्णव धर्म मुताबिक मानव जीवके कल्याणके वास्ते एकटा मंदिर निर्माण क्याके वो मन्दिरके भितरमै लक्ष्मी नारायणके मुर्ति स्थापित केने रहे। बौई मुर्ति कालमे पालसेन शैलीके प्रयोग क्याके छिछला पत्थरसे मुर्ति बनेने रहे। यै मदिरके माने माईझ निर्माण केला से लोकसब मानराजाके मदिरके नामसे पहिचाने लागलै ।
नेपालके तराई प्रदेशमे वौई समयमे मलेरिया कालाजर रोग महामारीके रुपमे फैलते रहे। तहै कारण बंगाली मुसलमानी फौज सबके यै ठाम हरैके साहस नइ करे सकलकै। यी बंगाली मुसलमानी फौज सब कोने घरानीसे २५ बर्ष तक दुःख कष्ठ सहैके नेपाल उपत्यकाके सम्पती लुटैलेल मात्रे रहल रहे। यी बंगाली मसलमानी फौज वि.स.१४०६ मंसिर शुद्धि ९ के दिन साइत जुराके पूर्वके सिन्धुली गढीके रास्ता हैत पहिने भक्तपुर शहरमे आक्रमण केसकै । तब सात दिन तक उपत्ययकाके तिनो शहरमें इनाम पिठाई करैत अपन इच्छा मुताबिक धन सम्पती ध्याने मुसलमानके के लुटहा दन घुइमके अपन देश चैन गेले। आष धार समाजने एकटा बरका हवा चलने कि यी तिरहुत प्रदेशके राजा हरिसिंह देव रहे। दिल्ली समाट सुलतान गयासुदीन तुगलकजे बंगाली मुसलमानी फौज सब राजा हरिसिंह देबके राज्य हरण केने रहे। ते दुआरे हुनकर जेठमा लरका मानसिह देबके तिरहुत राज्य फिर्ता होनाई जरुरी थिये। महापुरुषके बुद्धि सहि ठाममें प्रयाग हैरी कहषियोंमें है। माने माइक सत्यवादी, भोककल्याकारी, परोपकारी उदारवादी भेलासे सोइच-विचाइरके ८४ प्रगन्नाफे मैनजनसबके सर्व सहमत से बि.स.१४०६-७ साल दिशन मानसिह देबके पिता पुर्खाके हरण भेलहा राज्य सौइपदेलकै आ ८४ प्रगन्नाके गदीवाला राजा बनेनके । ताब माने माइझ नेपाल भारतके तिर्थ यात्रामे निकलै छ । माने माइभ इनार पौधऔर गड निर्माणके वास्ते बनेने छेने। की ठाम मार्नासह अपन दरबार निर्माण करौलकै ज मान नगरके नाम मानराजा रखौलके। अपन माइ इश्वरबती देवी के सम्मानके लेल इसरा बंशके स्थापना करयाक भारु समाजने परिचित बनीलकै । एकर बादमे मानसित देबके पिढीदर पिढी गादी चौरासीबाला राजा बने लागले। यसै क्रममें विजयपुर राज्यके राजा महीपति सेनके द्वारा वि.स.१७८३ में मान्यता प्राप्त राज्य संचालक शासकके रुपमे मध्यकालमे रणपाल चौधरी इसर बंशके स्याह मोहर प्राप्त भेलै ।
मामराजा माने माइकके समयमे इष्ट देवीके भान बनाबैके सन्दर्भमे नतिन जमाई जय स्थिती मस्त हरिसिह देब और देबल देबीके मंदिर सिरहा जिल्लाके हरिसिद्धपुर हालमे हरिनगर पताइरमे निर्माण क्याके पूजापाठ आ देखभाल करैके जिम्मा पाते माइझके देलकै। नि सन्तान पाते माइझके मेवासे खुशी भ्याके ठाकर-ठकराइन। हरिसिह देव और देवल देबी) सपन देलकै। सपना मुताबिक पाते माइक ठाकुर-ठकुराइनके मंदिरके उत्तर बगलमे पोखैर बनेलकै । जे पौखैर लगभग ६-७ बिगहाके रकनामे पानी झाववाला जिर्णद्वार भ्याके बर्तमानमे पचावत है। गुरसितल पाचैनसे एक दिन पहिने सुवहमे माणिक दहमें स्नान कैरके सलहेश फूलवारमे फूल लौइरके तकर विहान भने विधि पूर्वक पूजा-पाठ क्याके अपन खनेलहा पौखैरमे स्नान करलासे फलित भेलै। यि बात समाजमे ने पचले । ताब प्रचार प्रसार हैले लाग्लै । नेपालके तराई प्रदेश लगायत छिमेकी देश भारतके भक्तजन सबके मालुम भगेले । जकर चलते जुरशितलसे एक दिन पहिने सुबहमे माणिक दहमे दोपहरमे या बरिया पहर सलहेशकं फलवाइरमे मेला लागे लागले। ओकर बिहान भने पताई पौखैरमे श्रद्धालु भक्तजन सबके साचे अन्य दर्शक सबके प्रत्येक साल मेला लागे लागल । नि सन्तान दाम्पतीम जन-विश्वास भेलासे अखनतक सब साल माने माइक्रके माणिक दह, सलहेश फूलबाहर और पाते माइककें पताइर पोखैर-मंदिरमे मेला लाइगलहल है। यी मेला मध्यकाल मेही लाइगरहल छै। माणिक दह लगभग २०-२१ बिगहाके रकवामे पानी काववाल जिणोद्वार भ्याके वर्तमानमें यथावत
मानराजाके भग्न मदिर सप्तरी जिल्लाके बहुत प्रान मानल जाइछे। यी मंदिर और मानगढ़ राजर्जायराजसे पश्चिम १३ कि.मी. में अबस्थित छै। यी मंदिर मानराजा गाँवके मध्य भागमें भग्न अवस्थामे छै। जे में छत नै छै । पूर्व मुहके मदिरके भितर पसैके नेल साकार रास्ता देने जाइलेपरैछ। मदिरके इटा १७ इन्बके छै। मंदिर लगभग ४ कष्ठाके रकवामे छै । मदिरके भितर लक्ष्मी नारायणके मुक्तिं खण्डित अवस्थामे छै। देखलासे अनुमान लागे छ जे बिदेशी आक्रमणकारी तोरने छै। मदिरमे कोनो चल अचल सम्पती नै छै। मानगढ़मे २ विगहा पानी कवक विस्तर पोखैरके निर्माण भेल रहे। तै पोखैर महारपर १२ हात गोलाई पेटीके इनार निर्माण भेल छै। बैठामके इंटा मंदिरके इटा और गढ़के इटा तिनु मिलैत जुलैत है। मानराजाके समयमे रायझमुना प्रगन्नामें बहुत बढियां में बिकास भेल रहे । अखनतो बोइगामके मानराजा कलैके पुकारल जाइछै ।
पुरातत्व विभागके प्रतिबेदनमे मानराजाके मदिरके बास्तुकलाके नमुना नेपालमे बहुत कम पाइब रहल छै । मंदिरके प्राचिन्ताके प्रमाण मुर्तिकलासे बुझल जाइछै। मानराजाके मंदिरमे प्रतिस्थापित मूर्ति पानसेन शैलीक प्रयोग भेल छै। मुर्तिकलामे छिछला पत्थरके प्रयोग भेल है।
बृज पितामह बरियार माइक्रके लरका माने माइक २ जे मानराजा भेलै । हुनकार जेठका लरका कल्गण साइक-३ भेल। कलसण माइकके बैठका लरका हारे माइक ४ भेल। हारे माइझके सइझला नरका रथि माइक-५ के छोर बंश बर्तमानमे सप्तरी जिल्ला रागक्रम्ना प्रगन्ना अन्तंगातके तरही गांवमे अखनतो तब विद्यमान छै।
हमर विचारमे पताइर पोखैरके दक्षिण महारमे राजा हरिसिंह देवके नातिन जमाई भ्याके जयस्थित मल्ल द्वारा मंदिर निर्माण कैरके हरिसिह देव और देवल देबकीके ठाकर-ठाकराइन के रुपमें स्थापित करौने छै। तहनग मानसिह देव राजा हरिसिह देबके जेठका लरका मेलासे मंदिर निर्माण क्याके हरिसिंह देव और इसरबती देबीके मूर्ति स्थापित करेना चाहि, लेकिन मंदिरमे लक्ष्मी नारायणके मूर्ति स्थापित भेला सभी प्रमाणित है है कि माने माइझ द्वारा मंदिर निर्माण क्याके लक्ष्मी नारायणजीके मूर्ति स्थापित कराने छै। माने माइक मानराजा भेनासे मानराजाके मदिरके रुपमे परिचित भेल है और बोई ठामके नाम मानराजा परलछे माने माइक मानराजा थिये।
श्रोत साम्रगीसव
१) बारु जाति एक अध्ययन मेदनी प्रसाद शर्मा (
( २) बारु जाति र तिनको संस्कृति-ईश्वर बराल
(३) लबपूर्णिमा थारु मासिक पत्रिका- सप्तरी
(४) बारु संस्कृति २०६१ पौष मुलाइ चौधरी
( ४) ईसरा थारु बंशाबली पुस्तिका-२०६४
(६) तिरहुत बंशावली किताब-२०५८
(७) नेपालको माध्यमिक कालको इतिहास-ज्ञानमणि नेपाल
(८) लोक तथा जनमुती
(९) विभिन्न पत्रपत्रिका
(१०) सप्तरी दर्षण
(११) बक पत्र पंचु दास दुरा ११ मधुपट्टी, दुर्गानन्द चौधरी (शिक्षक) १४ पडरिया